सीएम धामी की सख्ती से खुलती चली गई भर्ती घोटाले की परतें, हरीश रावत और त्रिवेंद्र सरकार में सामने आई थी गड़बड़ी, 2020 में बच निकला था हाकम सिंह

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देहरादून। उत्तराखंड में समूह-ग की भर्तियों के लिए 17 सितंबर 2014 को तत्कालीन हरीश रावत सरकार में अस्तित्व में आए उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की भर्ती गड़बड़ियों पर सरकार पहले चेत जाती तो आज यह भर्ती घोटाला नासूर न बनता। वर्तमान धामी सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक्शन लिया और अब तक 41 घोटालेबाज सलाखों के पीछे जा चुके हैं।

सबसे पहले तीन परीक्षाएं कराई, तीनों विवादित
वर्ष 2016 में यूकेएसएसएससी ने तीन परीक्षाएं कराईं। तीनों ही विवादित रहीं। आयोग ने अपने गठन के बाद वर्ष 2015 में ही 16 एजेंसियों में से विवादित आरएमएस टेक्नो सॉल्यूशन का चयन किया। इसके बाद आयोग ने सबसे पहले असिस्टेंट एकाउंटेंट ट्रेजरी के पदों पर भर्ती कराई। इस भर्ती में हुए चयन पर तत्कालीन सदस्य दीवान सिंह भैंसोडा ने ही सवाल उठाए। इस परीक्षा में उस समय के आयोग से जुड़े बेहद ताकतवर अफसर के सगे भतीजे का भी चयन हुआ। इसके बाद दूसरी परीक्षा कम्प्यूटर सहायक के पद की हुई, लेकिन इसका नतीजा 2016 में ग्राम पंचायत विकास अधिकारी के 196 पदों के लिए कराई गई भर्ती के परिणाम के बाद आया। कम्प्यूटर सहायक समेत ग्राम पंचायत विकास अधिकारी के परिणाम जारी हुए। इन दोनों ही परीक्षाओं के नतीजे विवादों में रहे। ग्राम पंचायत विकास अधिकारी के पदों पर तो एक ही परिवार के पांच पांच सदस्य चयनित हुए। गजब ये रहा कि एक ही परिवार के सदस्यों ने अलग अलग जिलों से परीक्षा दी। इस गड़बड़ी की सरकार ने तत्कालीन अपर मुख्य सचिव रणवीर सिंह की अध्यक्षता में जांच कराई। जांच में भी परीक्षा में गड़बड़ी, टेंपरिंग की पुष्टि की गई। विजिलेंस का केस तक दर्ज हुआ, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी दौरान यदि सख्त कार्रवाई हो जाती, तो आज ये बड़ा विवाद न खड़ा होता।

गड़बड़ियां चलती रही लेकिन कार्रवाई नहीं
इस गड़बड़ी के बाद तत्कालीन अध्यक्ष आरबीएस रावत ने इस्तीफा दिया। जो छह महीने तक स्वीकार नहीं हुआ। इस दौरान वे लगातार भर्ती प्रक्रिया से जुड़े रहे। गड़बड़ी पाए जाने के बावजूद आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की। लगातार धांधली चलती रही। इस मामले में सवाल ये है कि क्यों अध्यक्ष का इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ? जब उन्होंने इस्तीफा दे दिया, तो क्यों वे लगातार भर्ती प्रक्रिया से जुड़े रहे? सवाल यह भी है कि जिस पेपर लीक की दागी आरएमएस टेक्नो सॉल्यूशन कंपनी का करार 2019 में खत्म हो गया था, उससे आयोग लगातार भर्तियों के पेपर छपवाता रहा। सवाल यह भी है कि रुड़की में सरकारी प्रेस होने के बावजूद निजी प्रेस से पेपर क्यों छपवाए गए। दागी कंपनी को प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों में किस आधार पर काम दिया गया।

धामी की सख्ती के बाद खुलती चली गई घोटाले की परतें
2016 से शुरू हुआ घपला, 2022 में सीएम पुष्कर सिंह धामी की सख्ती के बाद बंद हुआ। 2016 में कांग्रेस की सरकार के बाद 2017 से त्रिवेंद्र सरकार आई लेकिन भर्ती घोटाले के सिंडिकेट पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। इस साल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बाद जब शिकायत पहुंची तो उन्होंने इसकी गंभीरता को देखते हुए एसटीएफ से जांच कराई। धीरे-धीरे परतें खुली और अब तक 41 आरोपी सलाखों के पीछे जा चुके हैं। यूपी से लेकर उत्तराखंड तक फैला नकल माफियाओं का नेटवर्क भी धामी सरकार ने ध्वस्त कर दिया।

2020 में बच निकला था हाकम सिंह
2020 में हरिद्वार जिले में फॉरेस्ट गार्ड भर्ती परीक्षा में ब्लूटूथ से नकल मामले में हाकम सिंह रावत बच निकला था। मंगलौर थाने में आलोक की शिकायत पर मुकदमा दर्ज हुआ था। हाकम सिंह, मुकेश सैनी, कुलदीप राठी, गुरुबचन, पंकज समेत कई आरोपी बने। लेकिन इनमें से किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। न ही पुलिस ने कोई एफआर लगाई गई। माना जा रहा है कि उसी दौरान यदि इस सिंडिकेट को दबोच लिया गया होता, तो राज्य के युवाओं के साथ इस तरह कोई छलावा नहीं होता।

अंतिम आरोपी के पकड़े जाने तक जांच जारी रहेगी-सीएम
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई पूरी सख्ती के साथ की जा रही है। चार्जशीट दाखिल करने की कार्रवाई की गई है। मैंने पहले भी कहा है कि जब तक अंतिम आरोपी नहीं पकड़ा जाएगा, तब तक जांच चलेगी। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की परीक्षा में घपले घोटाले के काम चलता रहा है। कुछ बेरोजगार छात्रों ने मुझे जैसे अवगत कराया, तो हमने यह प्रयास किया कि लंबे समय से जो यह सब चल रहा है, उसको रुकना चाहिए। वह रुका है। अभी तक 41 लोगों की गिरफ्तारियां इसमें हो चुकी है।





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